Monday, 19 June 2017

जनतंत्र का अधबीच


Common Man.
शौक है आपका पर खबरदार मंत्री जी की नियर को डियर कहा। वो नाराज हैं क्योंकि नेत्री भी कभी अभिनेत्री थी। देश को चीन ने चूना लगाकर पान खिलाया क्योंकि आपने चाऊ को झूला झुलाया। गुलकंद-चेरी वो खुद चाट गया, कत्था-लौंग आपको बांट गया। बात कोई नहीं है, हम दूसरे गुट में मिल जाएंगे, फटे के चीरे सिल जाएंगे। नापाक पड़ोसी  की नापाक हरकतें, हमारी दोस्ती पर खाक हरकतें, हो गर्इं अब सब राख हरकतें। कश्मीर में जवान लड़ रहा है, उसका भी सब्र तीरे पर चढ़ रहा है, आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है? वैसे आतंक जगहों के हिसाब से बंटा है  पूर्वांचल, मध्य और उत्तर में भी छंटा है। कहीं नक्सल, माओ का आतंक है, कहीं रणवीर सेना का नाम नि:शंक है। बहें कहीं भी खून अपना ही है। इसे रोकना अभी सपना ही है। सावधान, महिला ने मंत्री को किस किया, लोगों ने सीन को मिस किया। सामना है सबका इसलिए गाल पर है, नेताजी की नजर भी माल पर है। आपको इस बात इसे जलन क्यों है? आपके पास बातों से बहलने वाला मन क्यों है? बात मन की हो या तन की, लोगों को परिणाम चाहिए, सरकार करे दिखना वो काम चाहिए। फ्यूल के दाम, सिरदर्द लोगों का है, सावधान बरसात मौसम रोगों का है। मुझे तसल्ली है महंगाई से पीडि़त मैं ही नहीं हूं, तुमभी हो बांके। कितने जाने कितने आलम सुकूंन की आस में झांके....खबरदार खबरिया खबर लाया है....मिटाने को गम रबर लाया है....खबर है भारत में  विदेशी निवेश को लेकर जंग जारी है, घरेलु उद्योग बंद, बेरोजगारों की हालत भारी है...रोजगार विदेशी पैदा करेंगे, हम उन पर निर्भर हो जाएंगे, उन्होंने हाथ खींचा तो मर जाएंगे....वो ब्लैकमेल करेंगे, हम डरेंगे-हम डरेंगे....लोग चीनी सामान का बहिष्कार करना चाहते हैं, पर विकल्प कहां है, देश अभी बालपन में, नहीं जवां है....आम को आम की तरह चूस लो, किसने कोसा है... हर  प्यारे मंत्री को महिला कार्यकर्ता का बोसा है...योग योग है स्वास्थ्य की गारंटी है- गरीब, भूखे, कुपोषितों की बज रही घंटी है, योग से भूख कम हो तो बात है....कुछ जगह केवल रात है...स्वास्थ्य वो बनाएं जिनके मस्त शरीर है, कुपोषित पोषण आहार को अधीर हैं.....जीएसटी का तूफान सड़क पर आम है, खास को फर्क क्या जनता का काम तमाम है। बात करते जनतंत्र की, जन और तंत्र में भेद है, इस बात का शुरू से ही खेद है.... एक आमजन तंत्र की वजह से मर गया.....तिरंगे का मन दर्द से भर गया.... जन मरकर स्वर्ग को जाने लगा, ऊपर वाले का मन घबराने लगा.... उसे बीच में रोक दिया, वो त्रिशंकु बन गया, फलक पर आसमां सा तन गया.... वो बोला- यहां न ऊंच न नीच है, न सुशासन का जल, न भ्रष्टाचार का कीच है,  शायद यही जनतंत्र का अधबीच है....शायद यही जनतंत्र का अधबीच है.....